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भवन के शिलान्यास का समय आने में लग गए पांच साल

गुरुग्राम दुनिया 21वीं सदी में पहुंच गई, लेकिन सरकारी कामकाज का ढर्रा नहीं बदला। वर्षों पुरानी कछुआ चाल से ही बाबू से लेकर अधिकारी चल रहे हैं। कंप्यूटर क्रांति के इस युग में भी बदलने को तैयार नहीं हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो आबकारी एवं कराधान भवन के शिलान्यास का समय आने में पांच साल नहीं लगते। जमीन की रजिस्ट्री वर्ष 2013 में हो गई, लेकिन शिलान्यास मंगलवार को मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने किया। यह हाल तब है जब प्रदेश सरकार के राजस्व भंडार को भरने में आबकारी एवं कराधान विभाग का गुरुग्राम कार्यालय अकेले लगभग 30 प्रतिशत भूमिका निभाता है।

जानकारी के मुताबिक आबकारी एवं कराधान भवन बनाने की चर्चा वर्ष 2011 में चलनी शुरू हो गई थी। वर्ष 2012 में सेक्टर 32 इलाके में जमीन चिन्हित की गई। वर्ष 2013 में जमीन की रजिस्ट्री हुई। इसके बाद बिल्डिंग बनाने के लिए राशि रिलीज करने में चार साल से अधिक समय लग गए। इस तरह शिलान्यास का समय आने में लगभग पांच साल लग गए। बनने में भी कम से कम तीन से चार लगेंगे। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार के काम करने की गति क्या है? गुरुग्राम जैसे शहर में सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी वर्षों लगा दिए जाते हैं।

प्रदेश सरकार को विभाग से मिलते हैं सालाना साढ़े आठ हजार करोड़

आबकारी एवं कराधान विभाग गुरुग्राम से प्रदेश सरकार को सालाना औसतन साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये राजस्व के रूप में प्राप्त होते हैं। इस तरह पांच साल के दौरान विभाग ने सरकार के खजाने में लगभग 40 हजार करोड़ रुपये जमा कराए। इनमें से 57 करोड़ रुपये सरकार को रिलीज करने में पांच साल लग गए। यदि विभाग के गुरुग्राम कार्यालय के पास कुछ राशि खर्च करने का अधिकार होता तो कब का भवन बन जाता। स्थिति यह है कि स्थानीय अधिकारी एक कुर्सी तक अपनी मर्जी से नहीं खरीद सकते। ऊपर से ही स्वीकृति लेनी पड़ती है। बता दें कि सेक्टर 32 में 1.5 एकड़ भूमि पर आबकारी एवं कराधान भवन बनेगा। छह मंजिला इमारत में तीन बेसमेंट पार्किग होगी। बनने के बाद एक ही छत के नीचे विभाग के सभी कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों के लिए ही नहीं बल्कि विभाग से संबंधित सभी अधिवक्ताओं के बैठने के लिए भी जगह होगी।

अब जितनी जल्द हो निर्माण कार्य पूरा कराया जाएगा। हर साल सालाना दो करोड़ रुपये किराए के रूप में देने पड़ते हैं। यही नहीं इतना किराया देने के बाद भी जितनी जगह चाहिए, नहीं है। पार्किंग की सम