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अस्पताल में लैब टेक्निशियन के 14 पद, कार्यरत सिर्फ चार, रिपोर्ट का रहता है इंतजार

 हिसार : नागरिक अस्पताल की लैब में मैनपावर की कमी का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि जिले की एक मात्र सरकारी लैब होने के बावजूद यहां अव्यवस्थाओं की भरमार है। यहां रोजाना करीब 200 मरीज विभिन्न बीमारियों की जांच करवाने के लिए खून और यूरिन का सैंपल देकर जाते हैं, लेकिन लैब में पर्याप्त टेक्निशियन ना होने के कारण रिपोर्ट का घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। अतिरिक्त कार्य के बोझ तले दबे टेक्निशियन बताते हैं कि स्वीकृत लैब टेक्निशियन के पद 14 हैं मगर कार्यरत सिर्फ चार हैं। इसके अलावा एकमात्र सीनियर लैब टेक्निशियन भी प्रतिनियुक्ति पर कैथल गए हुए हैं। ऐसे में अंदाजा लगा सकते हैं कि सैकड़ों सैंपल लेना, टे¨स्टग करना और रिपोर्ट तैयार करने में वक्त तो लगेगा ही। यह तो कुछ भी नहीं है। कई बार सैंपल ही बदल जाते हैं या गुम हो जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी यूरिन सैंपल जांच करवाने वाले मरीजों को आती है। उनका दूसरे मरीज से सैंपल बदल जाता है या फिर मिलता ही नहीं। इन हालातों में कोई स्वस्थ भी हो तो वह भी रोगी बन जाए। ऐसा भी नहीं है कि स्वास्थ्य अधिकारी इन समस्याओं से अनजान हैं। पता होने के बावजूद भी समाधान करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं।

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डिप्लोमा होल्डर भी पीछे हट गए

 
 

 

पहले लैब रिपोर्ट का सत्यापन लैब टेक्निशियन अपने स्तर पर कर देते थे। ऐसे में कई बार रिपोर्ट सही नहीं मिलती थी। मान्यता प्राप्त लैब में जांच के दौरान कुछ और ही रिपोर्ट आती थी। ऐसे में एसोसिएशन आफ प्रैक्टि¨सग पैथोलॉजिस्ट ने वर्ष 2015 में हाईकोर्ट में केस दायर किया था। उसमें बताया था कि लैब को डीएमएलटी चला रहे हैं। नियमानुसार देखा जाए तो एमडी डॉक्टर लैब के लिए अधिकृत है। 2016 में हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए एमडी की अनिवार्यता को लागू करने के आदेश दिए थे मगर स्वास्थ्य विभाग ने एमडी ना होने का हवाला दिया था। तब एमबीबीएस डिग्री को निर्धारित किया था। राज्य सरकार ने उक्त नियम को प्रभावी ढंग से लागू करने के आदेश स्वास्थ्य विभाग को दिए थे। उद्देश्य यह था कि अनुभवहीन लैब संचालक और स्टाफ सैंपल टेस्ट करके रिपोर्ट नहीं देंगे। इससे मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ नहीं होगा और अन्य लैब की छवि धूमिल नहीं होगी। हालांकि उक्त आदेशों को लागू नहीं किया गया है मगर डिप्लोमा करने के इच्छुक भी बैकफुट पर आ गए हैं। यहां रोजगार की संभावना घटती दिखी तो काफी युवाओं ने किसी अन्य क्षेत्र में रोजगार के अवसर तलाशने शुरू कर दिए हैं। डीएमएलटी यानी डिप्लोमा इन मेडिकल लैबोरेटरी धारक उक्त फैसले के खिलाफ कोर्ट में गए थे।