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ऐतिहासिक धरोहरों पर अवैध कब्जा, एक माह में हटवाने के निर्देश

जागरण संवाददाता, कैथल :जिले की प्राचीन एवं ऐतिहासिक धरोहरों पर अवैध कब्जा है। इन धरोहरों से अवैध कब्जा हटवाने के लिए सरकार ने प्रशासन को आदेश जारी कर एक माह के अंदर रिपोर्ट देने के निर्देश जारी किए हैं। तहसीलदार व नायब तहसीलदारों ने ऐतिहासिक स्थलों पर कब्जे को लेकर प्रशासन को रिपोर्ट भेज दी है। इनमें तीन स्थल ऐसे हैं जिन पर लोगों का कब्जा है, जबकि दो प्राचीन स्थलों पर कोई कब्जा नहीं है, लेकिन रख-रखाव के अभाव में ये खंडहर होती जा रही है। यहां सुरक्षा की दृष्टि से भी किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है।

कैथल की ऐतिहासिक बावड़ी पुराना अस्पताल के नजदीक स्थित है। बावड़ी की जमीन पर कोई कब्जा नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार बावड़ी मुगलकालीन समय से जुड़ी हुई है। उस समय लाहौर से दिल्ली जो रास्ता जाता था उस रास्ते का कैथल केंद्र ¨बदु होता था। यह नेशनल हाइवे पर पड़ता था। लाहौर से दिल्ली जाने के लिए व्यापारी वर्ग इस रास्ते से होकर जाते थे। व्यापारियों के लिए पीने के पानी को लेकर बावड़ी में जल स्टोरेज किया गया था। सभी व्यापारी यहां आराम करते थे और जल लेने के बाद अपनी यात्रा शुरू करते थे क्योंकि यहां आसपास कोई बड़ी नदी नहीं थी। शाहाबाद के पास मारकंडा था जो काफी दूर पड़ता था। वर्ष 2003 में इस बावड़ी का कुछ जीर्णोद्वार हुआ था। उस समय तत्कालीन जिला उपायुक्त अनुराग अग्रवाल सहित शहरवासियों के सहयोग से इसके जीर्णोद्धार को लेकर काम शुरू किया था। उस समय इसके पानी की जांच को लेकर सैंपल भी लिए गए थे। काफी काम बावड़ी पर हुआ था। साफ-सफाई के साथ-साथ गेट व चारों तरफ कांटेदार तार भी लगाई गई थी। शहरवासियों ने भी इसके रखरखाव को लेकर एक समिति का गठन किया था। बावड़ी की खुदाई भी की गई थी, लेकिन अब फिर से बावड़ी के हालत बद से बदतर हो चुके हैं।

14 कनाल 15 मरले में शेख तैयब का मकबरा

शेख तैयब हुसन का मकबरा मुगलकालीन इतिहास समेटे हुए हैं, लेकिन वर्तमान में मकबरे के हालात बदतर है। मकबरा पर कोई कब्जा तो नहीं है, लेकिन रख-रखाव के अभाव में मकबरा खंडहर होता जा रहा है। इतिहास के बारे में जानकारी देने वाला बोर्ड जंग खा चुका है। जंग के कारण लिखे अक्षर मिटने लगे हैं। चंदाना-कुतुबपूर रोड पर लाखौरी ईटों से बनी यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है। इतिहासकारों के अनुसार शेख तैयब हुसन नामी संत थे। वे अरबी व फ्रांसीसी भाषा के अच्छे विद्वान थे। एक सामय था जब इस मजार पर सजदा करने वालों की भीड़ लगती थी। यहां मेला भी लगता था। मुगलकाल में लगभग 500 वर्ष पहले इसे बनाया गया था।