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बदलाव की मिसाल बन रही हैं महिलाएं

झज्जर : आज के आधुनिक युग में हमारी महिलाएं समाज में बदवाल की जनक बन रही हैं। खेत खलिहान में पुरुषों से भी आगे बढ़ते हुए समाज को नई दिशा दे रही हैं। स्वयं राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाते हुए अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की सीख दे रही हैं। जैविक खेती से तैयार हुए उत्पाद आजकल खूब ट्रेंड कर रहे हैं। हर ओर एक ही जिक्र है कि बेहतर स्वास्थ्य पाने की दिशा में जैविक खेती से तैयार किए हुए उत्पादों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जिला झज्जर की बात हो तो यहां की महिला किसानों के समूह प्रदेश के साथ-साथ देश के अन्य किसानों को भी दिशा देने का काम कर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर लगने वाले कृषि मेलों में इनके उत्पादों की धूम रहती है। वहीं ये महिलाएं एक आइकॉन के रूप में किसानों के बीच जाकर उन्हें जैविक खेती के बारे में जागरूकर करने के साथ उन्हें अपनी फसल से अनेक प्रकार के उत्पाद तैयार करने के अलावा अपनी आमदनी बढ़ाने की भी जानकारी देती हैं।

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मधुमक्खी पालन अपना कर मुकेश देवी ने जीता नेशनल अवार्ड : मलिकपुर गांव की महिला मुकेश देवी ने मधुमक्खी पालन कर जहां अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, वहीं 30 लोगों को रोजगार भी दे रही हैं। वह शहद से अनेक प्रकार के उत्पाद तैयार कर बाजार में उतार चुकी हैं और हर साल 60 से 70 लाख रुपये कमा रही हैं। उन्हें प्रदेश में पहली बार कोमहनी तैयार करने के लिए पूसा की तरफ से वर्ष 2016 में नेशनल अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। मुकेश देवी का कहना है कि उन्होंने वर्ष 2001 में अपने पति जगपाल फौगाट के साथ तीस बॉक्स से मधुमक्खी पालन का कार्य शुरू किया था। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और अब वे 2000 बॉक्स तैयार कर मधुमक्खी पानल कर रहे हैं।

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विदेशियों को भा रहे झज्जर के जैविक उत्पाद : सेहलंगा गांव निवासी प्रगतिशील किसान के रूप में शीला डागर के बाग के जैविक तरीके से तैयार किए गए किन्नू व मिश्रित सब्जियां विदेशी लोगों को भी भा रही हैं। पिछले साल जापान का प्रतिनिधिमंडल भी उनके फार्म का दौरा कर चुका हैं। देश में आने वाले विदेशी लोगों को यह प्रतिनिधि मंडल उनके उत्पाद उपलब्ध कराता है। चौ. चरण ¨सह कृषि विश्व विद्यालय में पिछेल वर्ष मार्च में प्रदेश सरकार की तरफ से सम्मानित किया गया था। डागर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में लगने वाले कृषि मेलों में हिस्सा लेकर अपने कृषि उत्पादों का प्रदर्शन करती हैं। उन्हें वहां पर सम्मान मिलने के साथ साथ प्रदर्शित किए गए उत्पाद का अच्छा रेट भी मिलता है। काफी महिलाएं ऐसी है जो अपने घर में किचन गार्ड में सब्जियां उगा रही है और खेतों में जैविक खेती के माध्यम से अपने परिवारों के लिए अनाज पैदा करती है। जबकि कई राज्यों के जागरूक किसान भी उनकी फसलों के बारे में जानकारी लेने के लिए उनके खेतों तक पहुंच चुके हैं। कृषि रत्न अवार्डी किसान व शीला डागर के पति भीम ¨सह सेहलंगा का कहना है कि वह 18 अक्टूबर 2011 से जहर युक्त खेती को अलविदा कह कर कुदरती खेती करने लगा था। उसकी पत्नी उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर जैविक खेती कर रही है। उन्होंने 12 एकड़ में किन्नू व 2 एकड़ भूमि में बेर का बाग लगाया हुआ है। इसके साथ ही वे सब्जियां व अनाज भी उगाते है। उनका कहना है कि हर साल एक एकड़ भूमि से सारा खर्च निकालने के बाद करीब 50-70 हजार रुपये प्रति एकड़ कमा लेते हैं। उन्होंने वर्ष 2013-14 में हरियाणा के पहले मान्यता प्राप्त कुदरती खेती किसान समूह खंड मातनहेल का गठन किया था। इस ग्रुप में सैकड़ों किसान जुड़े और उन्होंने जहर युक्त खेती को अलविदा कह कर कुदरती खेती अपनाई है। इससे पहले भी उन्हें व उनकी पत्नी शीला डागर को अनेक संस्थाओं की तरफ सम्मानित किया जा चुका है। शीला डागर महालक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की भी सदस्य हैं।