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127 वर्षीय आचार्य देवनायकाचार्य ने अपनी बताया लंबी उम्र का राज

 झज्जर : मध्यप्रदेश के दतिया के वैष्णव संप्रदाय के 127 वर्षीय स्वामी देवनायकाचार्य शहर के आनंद मोहन हाई स्कूल में पहुंचे। उन्होंने बच्चों को शिक्षा संबंधी बाते बतायई और शिक्षा को ग्रहण करने का मतलब क्या है विस्तार से बताया।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सरस्वती की सच्ची पूजा बुद्धि को बढ़ाना है। बुद्धि से ही मनुष्य का पूरा जीवन चलता है। उन्होंने बच्चों से कहा कि अपनी बुद्धि तेज करने के लिए सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करें और अपने गुरूजनों का आर्शीवाद लेकर अपने जीवन को सफल बनाए। उन्होंने आगे बताया कि जब उनका जन्म सन् 1890 में हुआ तो उनका शरीर निर्जीव के समान था। कुछ समय बाद उनके मां बाप ने उनको जंगल मे ले जाने लगे तो उनकी नानी ने उनमें जीवन दिखाई देने लगा और वो उसे वापस ले आई और वास्तव में ही मैं ¨जदा था। बड़ा होने के बाद यही सोचते हुए घर का त्याग कर दिया कि मैं एक साधु संत बनूंगा। उसके बाद बचपन में ही घोर तपस्या की व बड़ा होने पर धीरे-धीरे तीर्थ स्थानों की यात्रा की और आश्रम बनाया। उसमें गौशाला व कृषि योग्य भूमि है।

उन्होंने कहा कि योग व साधना से चार ची•ो बढ़ती है आयु, विद्या, यश, बल। उनके साथ मौजूद रहे नरेन्द्र अरोड़ा ने बताया कि आचार्य में विशेष तप और बल है जो परमात्मा का ध्यान, साधना करने पर मिला है। ये लंबी सैर पर जाते है बिना चश्में के 127 वर्ष की उम्र में पढ़ लेते है। भोजन के नाम पर नाममात्र फल लेते है अपना जीवन समाज को अर्पित कर दिया है। लोगों में अमृत ज्ञान वर्षा करते है। ऐसे योगियों से भारत भूमि महान है।