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अपराधी की सिर्फ उम्र नहीं, मनोदशा भी देखी जाए

 फतेहाबाद: गुरुग्राम में रेयान इंटनेशनल स्कूल के सात वर्षीय छात्र प्रद्युम्न की बेरहमी हत्या..। इस हत्याकांड ने हर अभिभावक को परेशान कर दिया था। पूरा देश सीबीआइ जांच की मांग कर रहा था। जब मामले की जांच सीबीआइ को सौंप दी गई तो न्याय की उम्मीद जगी। मगर झटका लगा, जब पता चला कि गिरफ्तार किया गया छात्र नाबालिग है। क्योंकि कानून में यही मान लिया जाता है कि अगर आरोपी नाबालिग है तो उसमें नासमझी है। मगर बुधवार को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के एक निर्णय ने उम्मीदों को फिर से ¨जदा कर दिया। बोर्ड ने कहा है कि आरोपी भले ही नाबालिग है, लेकिन उसके खिलाफ बालिग की तरह केस चलेगा। बोर्ड का यह ऐसा फैसला है, जिससे पीड़ित परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज में नई उम्मीद का जन्म हुआ है। अब लगने लगा है कि कानून की आड़ में खूंखार अपराधी बच नहीं सकता। प्रद्युम्न केस में आए इस निर्णय से समाज में क्या संदेश जाएगा? इस निर्णय से भविष्य में क्या बदलाव होने वाला है? कानून के जानकार इस निर्णय को किसी तरह से देखते हैं? इन्हीं तमाम सवालों को टटोलने के लिए दैनिक जागरण ने पैनल डिस्कशन किया। इस गोष्ठी में वकीलों ने अपनी अपनी राय रखी। जानिये किसने क्या कहा..

--निर्भया कांड के बाद हुआ था संशोधन: राकेश गर्ग

दिल्ली में हुए निर्भया कांड में सामने आया था कि सबसे ज्यादा द¨रदगी करने वाला आरोपी नाबालिग था। उसके बाद सरकार ने कानून में संशोधन किया था कि अगर कोई आरोपी 16 साल से ज्यादा उम्र का है और जघन्य अपराध में संलिप्त है, तो उसे नाबालिग होने का फायदा नहीं दिया जा सकता। उसी कानून के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने यह निर्णय सुनाया है। मैं मानता हूं कि जघन्य अपराधियों को नाबालिग होने का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

-राकेश गर्ग, एडवोकेट।

--अपराधी की मनोदशा अहम : संतकुमार

प्रद्युम्न केस में बोर्ड ने आरोपी स्टूडेंट की सामाजिक व मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट को आधार मानते हुए यह फैसला सुनाया है। दरअसल, अपराधी की उम्र देखा जाना काफी नहीं है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि उसकी मानसिक स्थिति क्या है। अगर एक नाबालिग से इत्तफाकिया कोई अपराध हो जाता है तो उसे अलग श्रेणी में रखा जाए। अगर कोई नाबालिग आपराधिक प्रवृति रखता है। आक्रामक व्यवहार करता है और उसमें बार बार अपराध के विचार आ रहे हैं तो उसके साथ कानून में सख्ती बरती जानी चाहिए। इसलिए बोर्ड का अच्छा निर्णय है।

-संतकुमार, एडवोकेट।

--16 साल में समझ आ जाती है: दुष्यंत गेरा

आजकल बच्चे टीवी देखते हैं और मोबाइल व इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। ऐसे में उनमें हर तरह की समझ जल्द आ जाती है। 15 साल की उम्र में बच्चों को यह समझ आ जाता है कि गलत क्या है और सही क्या है। ऐसे में एक 17 साल का लड़का किसी की हत्या या दुष्कर्म कर देता है तो उसे नाबालिग होने का फायदा नहीं मिलना चाहिए। आपराधिक प्रवृति के किशोरों के साथ सख्ती बरती जानी जरूरी है। बोर्ड के इस निर्णय से समाज में कानून के प्रति विश्वास बढ़ेगा।