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दिव्यांग अर्चना का हौसला और इरादे फौलादी

करनाल अर्चना मोर सिर्फ कहने को दिव्यांग है। हौसला और इरादे आम खिलाड़ियों से भी ज्यादा और मजबूत और फौलादी। तभी तो शादी के करीब 15 साल बाद भी मैदान से जुड़ी रही और जीती। जुनून इतना कि दो बच्चों की परवरिश के साथ खेल भी जारी रखा। आम महिला होती तो शायद हार मान लेती। लेकिन अर्चना को यह मंजूर नहीं था। हाल ही में सी¨टग पैरा वॉलीबॉल नेशनल गेम्स में राष्ट्रीय स्तर पर टीम के साथ गोल्ड जीता। बुधवार को करनाल पहुंची तो खिलाड़ी बहू का परिजनों ने जोरदार स्वागत किया। प्रेम नगर की एकता कॉलोनी में खुशी साझा करने के लिए रिश्तेदार व पड़ोसी भी मौजूद रहे। प्रदेश की महिला दिव्यांग टीम ने जयपुर में आयोजित पीवीएफआइ फेडरेशन कप 2017 जीता है। प्रतियोगिता का आयोजन पैरालंपिक वालीबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ से 16 व 17 दिसंबर को किया गया था। अब फरवरी में टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थाईलैंड में में अपना दम दिखाएगी। अर्चना मोर ने बताया कि पीवीएफआइ फेडरेशन कप में महिला टीम ने पहली बार भाग लिया। महिलाओं की छह व पुरुषों की 12 टीमें मैदान में थीं। फाइनल मुकाबला राजस्थान से था। महिला टीम ने 3-1 के अंतर से कप जीता। थाईलैंड में होने वाली प्रतियोगिता के लिए जल्द ही कैंप लगेगा।

एथलेटिक्स में भी स्टेट तक खेली

सोनीपत के कुंडली में जन्मी दिव्यांग खिलाड़ी अर्चना मोर को बचपन से ही खेलने का शोक है। 15 साल पहले करनाल में शादी हुई। अर्चना की लड़की की उम्र 15 साल व लड़का 12 साल का है। वालीबॉल के अलावा एथलेटिक्स में भी स्टेट खेल चुकी है। अर्चना का कहना है कि मायके के साथ-साथ ससुराल से भी पूरा सहयोग मिला।

जीत की खुशी के साथ अनदेखी का गम भी

अर्चना को जीत की खुशी है, साथ ही अनदेखी का गम भी है। सरकार से गुजारिश की कि दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए नौकरियों में भी आरक्षण ज्यादा रखे। ताकि वह खेल के साथ-साथ नौकरी कर अपने परिवार का पालन पोषण भी कर सकें। पेरा गेम्स के बारे में दिव्यांग खिलाड़ियों को अधिक पता नहीं होता। सरकार यदि दिव्यांग खिलाड़ियों को जागरूक करे तो हजारों का भला होगा।