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प्रद्युम्न हत्याकांड: न्यायिक प्रणाली के इतिहास में नजीर बनेगा यह फैसला

 गुरुग्राम पूरे देश को झकझोर देने वाला प्रद्युम्न हत्याकांड न्यायिक प्रणाली के इतिहास में नजीर बनेगा। संभवत: हत्या के मामले में पहली बार किसी जुवेनाइल को वयस्क के दायरे में रखने का फैसला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील टेकरीवाल कहते हैं कि 20 दिसंबर 2017 को भारतीय न्यायिक प्रणाली के इतिहास में ऐतिहासिक फैसला सुनाने के दिन के रूप में याद किया जाएगा। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड गुरुग्राम ने पूरे देश की न्यायिक प्रणाली के लिए रास्ता दिखाया है। इसी को आधार मानकर अब आगे अन्य बोर्ड फैसला सुना पाएंगे। इससे लाखों परिवारो के साथ न्याय होगा।

सुशील टेकरीवाल का कहना है कि जो दुनिया से चला गया, उसे कोई लौटा नहीं सकता, लेकिन जो बचा है वह सुरक्षित रहे इसके लिए भय जरूरी है। जुवेनाइल के नाम पर तीन साल की सजा होती है। सजा के दौरान भी आरोपी सुधार गृह में ही रहता है। बोर्ड का या परिवार के किसी सदस्य का पूछताछ के दौरान रहना आवश्यक होता है। सुधार गृह में उसे अहसास ही नहीं हो पाता है कि उसने कितना बड़ा अपराध किया था। नए कानून में बहुत बेहतर प्रावधान किया गया है। यदि 16 से 18 का किशोर संगीन अपराध करता है तो उसे वयस्क के दायरे में रखा जाएगा। इस प्रावधान के आधार पर बोर्ड ने फैसला सुनाया है।

पहले कानून होता तो निर्भया का मुख्य आरोपी नहीं बचता

टेकरीवाल कहते हैं कि नया कानून गत वर्ष आया है। यदि पहले इस तरह का कानून रहता है तो पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया को हिला देनेवाला निर्भया कांड में सबसे ज्यादा दरिंदगी करने वाला मुख्य आरोपी नहीं बचता। जुवेनाइल होने का फायदा मुख्य आरोपी को मिला। निर्भया के साथ सही मायने में न्याय नहीं हो पाया क्योंकि पुराने कानून का फायदा आरोपी को मिल गया। इसी तरह न जाने कितने आरोपियों को फायदा मिला। अब आगे से संगीन अपराध करने पर किसी को जुवेनाइल का फायदा नहीं मिलने वाला।