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आरक्षण के नाम पर गड़बड़झाला, असली हकदार को सेवादार की नौकरी

हरियाणा में नौकरी मे जातीय आरक्षण के लिए मारामारी के बीच सामने आए आंकड़े कर्इ सवाल खड़े कर रहे हैं। इससे आरक्षण के नाम पर गड़बड़झाला सामने आ रहा है। जिस आरक्षण के लिए पूरे हरियाणा को दो बार आग के हवाले कर दिया गया, उसकी जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। जो आरक्षण मांग रहे हैं उनका राज्‍य में सरकारी नौकरी में सबसेे ज्‍यादा प्रतिनिधित्‍व है और आरक्षण के सबसे अधिक हकदार दलितों को महज चतुर्थश्रेणी की नौकरी ही मिल पाती है।

दस फीसद आरक्षण मांग रहे जाट, जट सिख, मुल्ला जाट, त्यागी, रोड, बिश्नोई का प्रदेश की सरकारी नौकरियों में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व है। इन छह जातियों के लोग 75,840 पदों पर नौकरियां कर रहे हैं। ऐसे में कुल सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी सबसे अधिक 31.35 फीसद है। वहीं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर अनुसूचित जाति के लोगों की भागीदारी 40.13 फीसद है। ऐसे में स्पष्ट है कि उन्हें आगे बढ़ने का मौका ही नहीं मिला और वह सिर्फ प्‍यून की नौकरी करने या फिर फाइलें इधर से उधर भेजने की नौकरी के काबिल मान लिए गए हैैं।

संविधान में अनुसूचित जाति के लिए लोगों के जिस आरक्षण का प्रावधान किया गया है, नौकरियों में उनकी भागीदारी जाटों समेत छह जातियों से काफी कम है। अनुसूचित जाति के लोग 50,776 पदों पर नौकरियां कर रहे, जो कि कुल नौकरियों का 20.99 फीसदी बैठता है। अकेले जाट समुदाय की बात करें तो प्रदेश में इनकी आबादी 23 फीसद है, जबकि नौकरियों में हिस्सेदारी 29 फीसद तक पहुंच चुकी है। बाकी पांच जातियों की नौकरियों में हिस्सेदारी मात्र 2.35 फीसद रह गई है।

हरियाणा में प्रथम श्रेणी की नौकरियों में भागीदारी की बात करें तो जाटों से आगे बनिए, ब्राह्मण, राजपूत और पंजाबी आते हैैं। प्रथम श्रेणी की नौकरियों में जाटों समेत छह जातियों के लोग 1295 पदों पर कायम हैैं और उनकी कुल हिस्सेदारी 27.61 फीसद है। वहीं बनिए, ब्राह्मण, राजपूत और पंजाबी 1861 पदों पर काबिज हैैं और उनकी हिस्सेदारी 39.68 फीसद बैठ रही है।