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शहर में सड़कों और गलियों में पड़ा रहता है कूड़ा

झज्जर : शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर कभी कोई तो कभी कोई योजना बनाई जा रही है। लेकिन कोई भी योजना सिरे नहीं चढ़ पा रही है और शहर में जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। शहर की सफाई व्यवस्था पर हर माह नगर पालिका की तरफ से करीब 28 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद शहर गंदगी से अंटा पड़ा है। हर तरफ गंदगी के ढेर नजर आ रहे हैं। शहर की सफाई के लिए नगर पालिका में 147 कर्मचारी कार्यरत हैं। इनमें 126 कर्मचारी अनुबंध के आधार पर लगाए गए हैं। जबकि 21 पक्के कर्मचारी हैं। इतना होने के बावजूद शहर के अधिकांश वार्डों में तीन से चार सफाई कर्मचारी ही नजर आते हैं। जबकि शहर में 19 वार्ड हैं। इनके वेतन पर करीब 25 लाख रुपये हर माह खर्च हो रहे हैं। जबकि कूड़े के उठाने, कूड़ादानों को खाली करने पर करीब 3 लाख रुपये वेतन के अतिरिक्त खर्च हो रहे हैं। इतना होने के बावजूद समय पर कूड़ादानों को खाली नहीं किया जा रहा है। इसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो शहर की सुदंरता को ग्रहण लग गया हो। शहर से हर रोज करीब 5 टन से अधिक कूड़ा निकल रहा है, लेकिन इस कूड़े को ठिकाने कैसे लगाया जाए यह समस्या नगर पालिका के सामने खड़ी है। एक तरफ जहां नगर पालिका के पास कूड़ा निस्तारण के लिए कोई ठोस व्यवस्था तक नहीं है। शहर से निकलने वाले कूड़े के निस्तारण के लिए अनेक बार योजनाएं बनाई गई, लेकिन सभी योजनाएं विफल हो गई। पहले झज्जर के कूड़े को बहादुरगढ़ ले जाने की योजना बनाई गई। वह भी सिरे नहीं चढ़ पाई है। शहर की हालत बदहाल हो चुकी है। जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। नपा की ओर से शहर की सफाई व्यवस्था की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जबकि सफाई व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी सफाई दरोगाओं को दी गई है। शहर के कूड़ादानों को समय पर खाली किया जा रहा है। वर्ष के सीजन में स्थिति और अधिक विकट होती जा रही है। कूड़ादानों के आसपास पड़ा रहता है। आम आदमी भी शहर की सफाई व्यवस्था के लिए जागरूक नहीं है। घरों या दुकानों से निकलने वाले कूड़े को या तो कूड़ादानों के बाहर फेंक दिया जाता है या फिर नालों में फेंक का अपने फर्ज की इतिश्री कर ली जाती है। नगर पालिका की तरफ से शहर में नए कूड़ादान खरीदने की योजना का प्रस्ताव नपा के हाउस की बैठक में पारित हो चुका है। लेकिन आज तक कूड़ादान खरीदे नहीं गए हैं। घर-घर कूड़ा एकत्रित करने के के लिए पांच टैंपों खरीदे जाने की योजना भी अभी तक अधर में लटकी हुई है।