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घट रहा चने की खेती का रकबा

 पलवल:एक समय पलवल जिले में दलहनी फसल चना बड़े पैमाने पर होती थी। अब पलवल जिले के किसानों ने चने की फसल को न कह दिया है। अब तो चने का खेत ढूंढने से भी नही मिलता। इस समय जिले के केवल चार या पांच हैक्टेयर क्षेत्र में ही चने का उत्पादन नजर आता है।

चना अच्छे जल निकास वाली दौमट रेतीली व हल्की भूमि में अच्छा होता है। खारी व कल्लर भूमि इसके लिए अच्छी नही होती। सेम वाली भूमि यानि जहां पानी की सतह ऊंची हो, वहां भी चना नही होता। पहले खेती वर्षा जल पर निर्भर थी तथा भूमिगत पानी का स्तर पर ऊंचा था। अब नलकूपों द्वारा पानी का अत्यधिक दोहन होने से नीचे की भूमिगत परतों में जमा लवण ¨सचाई के पानी में भूमि की ऊपरी सतह पर जमा होने से भूमि का खारी अंश बढ़ गया है। इससे चने की पैदावार पर जबरदस्त असर पड़ा है। कम पैदावार, रोग व कीटों का ज्यादा प्रकोप होने से भी चने की फसल के प्रति किसानों का मोह भंग हुआ है। आवारा पशु, नीलगाय, बंदर, तोता आदि भी इस फसल के दुश्मन हैं। इसकी फसल पर मौसम का भी प्रभाव ज्यादा पड़ता है। पाला, ठंड तथा मौसम के जल्द गर्म होने से भी इसकी उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है।

चने का उपयोग दाल, बेसन के रूप में किया जाता है। इसकी हरी पत्तियां साग बनाने में प्रयोग होती हैं। इसका भूसा पशुओं के लिए भी उपयोगी है। इसमें प्रोटीन कोलेस्ट्रॉल रहित, वसा, कार्बोहाइड्रेड, लौहतत्व आदि खनिज होते हैं। गुणों में यह बादाम से कम नही होता। इसका आटा मधुमेह व हृदय रोगियों के लिए लाभदायक होता है। जिले में चने का उत्पादन न होने से किसानों को भी यह बाजार से खरीदना पड़ता है।