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तीन सालों से अलग चल रहे रणजीत तंवर फिर एक साथ

कांग्रेसखेमे में सियासी समीकरण में इन दिनों तेजी से बदलाव होने लगे हैं। इस बदलाव के तहत पिछले करीब तीन बरसों से कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पूर्व सांसद डॉ. अशोक तंवर और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूर्व सांसद रणजीत सिंह के बीच जो 36 का आंकड़ा चल रहा था वह अब खत्म हो गया है। अब दोनों पूर्व सांसदों को अच्छी-खासी जुगलबंदी होने लगी है। आए दिन कहीं कहीं किसी किसी बहाने मुलाकातें भी होने लगी हैं और भविष्य में एक दूसरे के जीत के परचम लहराने में हरसंभव मदद करने का भरोसा और यकीन जताने लगे हैं। 

इतना ही नहीं इन दोनों कांग्रेस नेताओं ने बीते दिनों फतेहाबाद में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की ओर से आयोजित दलित सम्मेलन से भी दूरी बनाए रखी। तंवर को तो दलित सम्मेलन के लिए आमंत्रित ही नहीं किया जबकि रणजीत सिंह ने आमंत्रण मिलने के बावजूद भी सम्मेलन में शिरकत करने जहमत ही नहीं की। बता दें, करीब तीन साल पहले जब हरियाणा विधानसभा चुनाव हुए थे तब रानियां विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर रणजीत सिंह अपनी किस्मत आजमा रहे थे। लेकिन उस चुनाव में अशोक तंवर ने रणजीत सिंह का अंदरखाने विरोध किया। इतना ही नहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी तंवर के नक्शे-कदम पर चले। नतीजतन, रणजीत सिंह चुनाव में पराजित हो गए और तब से रणजीत सिंह का तंवर और हुड्डा से वैचारिक मतभेद शुरू हुआ। हालांकि उसके बाद हुड्डा से तो रणजीत सिंह फिर भी कभी-कभार बतियाते रहे और बीते जून माह में सिरसा की अनाज मंडी में रणजीत सिंह ने अपनी सियासी ताकत दिखाने के लिए रैली भी की। लेकिन उस रैली की सफलता का श्रेय भी हुड्डा ने रणजीत सिंह को नहीं दिया तो रणजीत सिंह हुड्डा से पूरी तरह से खफा भी हो गए। तब से रणजीत सिंह ने हुड्डा से बातचीत करना भी बंद कर दिया।

चूंकि रणजीत सिंह और भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहपाठी भी रहे हैं इसलिए उसी दोस्ती की दुहाई देते हुए हुड्डा ने रणजीत सिंह को फोन कर फतेहाबाद के दलित सम्मेलन में आने का न्यौता भी दिया लेकिन रणजीत सिंह ने उसे स्वीकारा नहीं। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष तंवर की कार्यशैली को नापसंद करते हुए पिछले कई महीनों से सिरसा जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने भी तंवर से दूरी बनानी शुरू कर दी। इससे तंवर अलग-थलग महसूस करने लगे तो उन्होंने कुछ नए कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया।