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भ्रष्टाचार से जंग में अफसरों का अड़ंगा, कोशिशों पर फेर रहे पानी

हरियाणा की मनोहर सरकार कहती रही है कि भ्रष्‍टाचार रोकना उसका मुख्‍य एजेंडा है। वह सत्‍ता संभालने के बाद इसके लिए प्रयास करती भी दिखी, लेकिन इसका उम्‍मीद के अनुरूप असर नहीं हुआ। जानकारों का कहना है कि मनोहर सरकार के प्रयासों पर उसके अफसर ही पानी फेर देते हैं। पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई कि हरियाणा में 31 फीसद तक भ्रष्टाचार कम हो गया है। एक केंद्रीय सर्वे एजेंसी के इस दावे को मुख्यमंत्री ने भी उपलब्धि बताते हुए अपने भाषणों का हिस्सा बनाया। लेकिन, भ्रष्टाचार का आकलन करती इस सर्वे रिपोर्ट में बाकी राज्य किस पायदान पर हैं, इसका अभी तक पता नहीं चल पाया।

अमूमन चर्चा होने ही लगी कि अब ऊपर (मुख्यमंत्री) के स्तर पर भ्रष्टाचार नहीं होता, लेकिन सरकारी सिस्टम की तह में जाने पर महसूस होता है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी हैैं। आखिर कौन नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से अंकुश लगे?  इसका जवाब भी सिस्टम में ही मौजूद है। पूरे सिस्टम में अपने ढंग से फील्डिंग जमा चुके बड़े अफसर ही सरकार के विश्वास और संकल्प की डोर को धीरे-धीरे काटने में जुटे हुए हैैं।

भाजपा शासित राज्यों में हरियाणा काफी अहम है। यहां के मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने सत्‍ता संभालने के पहले दिन ही भ्रष्टाचार को खत्म कर सुशासन व पारदर्शी व्यवस्था देने को अपना प्रमुख एजेंडा बनाया था। इसमें उन्हें सफलता भी मिली, लेकिन विरोधी वर्ग के पास बहुत ही ऐसी दलीलें हैैं, जिन्हें नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है। हकीकत यह है कि सरकारी मशीनरी का संचालन कर रहे अफसर नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार खत्म हो। अफसरों को कठघरे में खड़ा करने के लिए सरकार के वे गोपनीय परिपत्र ही काफी हैैं, जो सभी विभागाध्यक्षों, अतिरिक्त मुख्य सचिवों और जिला उपायुक्तों को लिखे गए हैैं।