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जीरो बजट खेती से नहीं करेंगे किसान आत्महत्या : डा. पालेकर

चौधरी चरण ¨सह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में दीनदयाल उपाध्याय जैविक खेती उत्कृष्टता केन्द्र द्वारा गुरुकुल कुरुक्षेत्र एवं ग्राम विकास गतिविधि हरियाणा प्रांत के सहयोग से तीन दिवसीय कार्यशाला का मंगलवार को आयोजन किया गया। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक खेती विषय पर आयोजित इस कार्यशाला का उद्घाटन किया। आचार्य देवव्रत ने हजारों किसानों को संबोधित किया। पदमश्री डा.सुभाष पालेकर ने कहा कि हरित क्रांति आने से हम खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर अवश्य हुए हैं लेकिन खेती में विभिन्न रसायनों पर निवेश, जलवायु परिवर्तन, खेती से विमुख हो रही युवा पीढ़ी बहुत बड़ी चुनौती है। हरित खेती के बाद वायुमंडल बदलाव आया है जो वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय है। खेतों में हरित क्रांति के दुष्प्रभावों के कारण ही किसान आत्महत्या कर रहा है। जबकि शहरों में धनी लोग खेतों में उगा जहरीला अन्न खाकर बीमारियों से मर रहे है। हमारे पास तकनीक है और वैज्ञानिक है। परंतु हमारे पास इस समस्या का हल नहीं है। इसी हल के बारे में आपको बताना चाहता हूं। जैविक खेती को आज स्वदेशी कहां जा रहा है। जो पूर्णतया गलत है। वर्मिग कंपोष्ट सहित विभिन्न प्रकार के जैविक उत्पाद सभी विदेशी है। पहले किसान को रासायनिक कंपनियां लूट रही थी। अब किसान को जैविक कंपनियां लूट रही है। कोई बदलाव नहीं आया है।

डा. पालेकर ने कहा कि जैविक खेती का एक मात्र विकल्प है जीरो बजट खेती। एक देसी गाय से 30 एकड़ भूमि पर खेती की जा सकती है। एक ग्राम गोबर में कंपोष्ट, वर्मिंग कंपोष्ट, सुक्ष्म खाद और कीटनाशक दवाओं की पूर्ति होती है। जीरो बजट खेती से 90 फीसद बिजली और 90 फीसद पानी की बचत होती है। इस पद्धति से पैदा हुए अन्न के दोगुणा दाम मिलते है। जीरो बजट खेती का ही परिणाम है कि सात लाख किसानों ने आत्महत्या नहीं की है। वह इस खेती का लाभ उठा रहे है। दिल्ली को प्रदूषण से बचाना है तो जीरो बजट खेती करनी होगी

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पराली जलाने से दिल्ली प्रदूषित नहीं होती है : इंद्रेश कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा कि खेती उत्तम थी, उत्तम है और उत्तम रहेगी। इसकी उपेक्षा गंभीर संकट पैदा करेगी। हमने विकास किया है , वैज्ञानिकों ने तकनीक विकसित की है। परंतु तकनीक सस्ती, सरल और सहज होने की बजाय मंहगी हो गई। जिसका लाभ किसानों को नहीं मिल पा रह है। आज आलम यह है कि कस्सी बनाने का काम भी इंडस्ट्री कर रही है। ऐसे कैसे चलेगा। पिछले दिनों सुनने में आया था कि अमृतसर से जलाई पराली से दिल्ली प्रदूषित हो रही है। यह कैसे संभव है। वैज्ञानिक भी समर्थन कर रहे है। प्रदेश का एक कृषि वैज्ञानिक मुझे बताए कि पराली से किस प्रकार प्रदूषण हुआ है। किसी ने रिसर्च की है तो बताए। उसको में स्वयं सम्मानित करूंगा। जहां पर किसानों के विकास और खेती में बदलाव की बात है। इसमें कई सवाल है। हमारे यहां लाखों रुपये किसानों के नाम पर होने वाली कार्यशालाओं पर खर्च किया जाता है। उसका लाभ किसानों को मिलता है। आज तक किसी ने नहीं देखा। वैज्ञानिक अंग्रेजी भाषा व अन्य भाषाओं में किसानों को बताते है। इसका कोई फायदा नहीं है। विदेशों में किसानों को उनकी भाषा में समझाया जाता है। हमारे देश में भी किसानों को किसान की भाषा में तकनीक और खेती के बारे में समझाना चाहिए। तभी कोई लाभ मिलेगा। इतना ही नहीं, कार्यशालाएं गांवों में जाकर आयोजित की जानी चाहिए। जिससे खेतों में प्रेक्टिकल के माध्यम से समझाया जा सके।

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प्राकृतिक खेती का भविष्य उज्जवल

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केपी ¨सह ने कहा कि हरियाणा सरकार तथा यह विश्वविद्यालय प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाने के लिए बहुत गंभीर हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि हकृवि में दीनदयाल उपाध्याय जैविक खेती उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया गया है। इस केन्द्र के माध्यम से किसानों को जैविक खेती के लिए खेत को तैयार करने से लेकर जैविक उत्पाद के मंडीक रण की संपूर्ण व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा विश्वभर में भारत के प्राकृतिक खेती के उत्पादों की बहुत मांग है। लेकिन हम मांग के अनुरूप इन उत्पादों की आपूर्ति करने में सक्षम नही हैं। इसलिए बढ़ती मांग को देखते हुए भारत में प्राकृतिक खेती का भविष्य बहुत उज्जवल है। सरकार ने देश में ऐसे केवल दो केन्द्र मंजूर किए हैं। नाबार्ड की ओर से भी जैविक खेती में किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए इस विश्वविद्यालय को 12 करोड़ रुपये की एक परियोजना प्रदान की गई है।