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खर्चीले कचरा प्रबंधन के खिलाफ लोग हुए लामबंद

नगर निगम गुरुग्राम में कचरे से ऊर्जा बनाने के संयंत्र लगाने जा रहा है, लेकिन इससे पहले ही लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। खास तौर पर पर्यावरण और कचरा प्रबंधन को लेकर काम करने वाले आरडब्ल्यूए और एक्टिविस्ट का कहना कि इस तरह के प्लांट प्रदूषण पैदा करते हैं। जब शहर की लगभग दो दर्जन सोसायटियों ने वैज्ञानिक तरीके से बगैर किसी सरकारी सहायता के विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन करके दिखाया तो प्रदूषण को बढ़ाने वाले इस खर्चीले संयंत्र की क्या जरूरत है?

वेस्ट टू इनर्जी के खिलाफ दे रहें हैं ये तर्क

- अधिकतर ¨हदुस्तानी घरों से जो कूड़ा निकलता है, उसमें 50 से 55 प्रतिशत ऑर्गेनिक कचरा या किचन वेस्ट होता है, जिसे जलाना मुश्किल है। इससे ऑरगेनिक खाद बन सकती है, इसका प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

- नए गुरुग्राम की लगभग दो दर्जन सोसायटियों ने बगैर किसी सरकारी सहायता के विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन प्रस्तुत किया है उदाहरण। इस तरह बाकी क्षेत्रों में काम हो सकता है।

- सोर्स सेग्रिगेशन यानी घरों में कूड़े की छंटाई से रिसाइकिल की जाने वाली चीजें निकाली जा सकती हैं। उसे पुन‌र्प्रयोग के लिए तैयार किया जा सकता है। वेस्ट टू इनर्जी प्लांट में इसे जला दिया जाएगा। इस तरह संसाधन नष्ट होगा

- विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन में कूड़े को ले जाने की लागत नहीं होती, वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में लागत लगेगी।

- कचरे में कई चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें जलाने से हानिकारक गैस वातावरण में फैलती है। ऐसी गैस कैंसर जैसी बीमारियों का भी कारण है। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा

- मिक्स्ड वेस्ट से बनी खाद भी जमीन के लिए हानिकारक होती है। क्योंकि इसमें लेड और ऐसी कई चीजें मिल जाती हैं। इस कारण बंधवाड़ी के पुराने प्लांट से बनी खाद के खरीदार नहीं थे।

- इससे कबाड़ के काम में लगे लोगों का रोजगार छिनता है।

- दिल्ली में ऐसा प्लांट सफल नहीं है। प्लांट से निकलने वाली राख आस-पास फैलने के कारण परेशान हैं।

ग्रीन तरीके से डिस्पोज किया जाए कचरा

हम लोगों ने कचरा प्रबंधन को लेकर काफी अध्ययन किया है और इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह वेस्ट टू एनर्जी कचरा प्रबंधन का सही तरीका नहीं है। इसलिए विरोध कर रहे हैं। वेस्ट टू एनर्जी से ज्यादा बेहतर है ग्रीन तरीके से डिस्पोज किया जाए। उससे कंपोस्ट या बॉयो गैस बनाई जाए। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में अगर ज्यादा तापमान में कचरा नहीं जलाया गया तो डाई ऑक्सीन गैस बनेगी, जो सेहत के लिए बहुत हानिकारक है। आरडीएफ (रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल) बनाने के लिए अच्छे क्वालिटी के प्लास्टिक की जरूरत होती है अगर उसे कचरे से पहले निकाल दिया जाए तो खराब क्वालिटी बचेगी। इससे जो आरडीएफ वह कोयले की तरह ज्वलनशील नहीं होगा। मिलेजुले कचरे से खाद खराब क्वालिटी की बनेगी।

- कंवलपाल बांगा, सृजन विहार, सेक्टर 43

नगर निगम एक बड़ी राशि खर्च कर एक ऐसा प्लांट लगा रही है, जो बाकी जगहों पर अस्वीकृत हो चुका है। इसकी लागत का बोझ अंतत: आम लोगों पर ही पड़ेगा। जो कंपनी कचरे से बिजली बनाएगी, वह 10 रुपये प्रति यूनिट होगी। तीन रुपये नगर निगम सब्सिडी देगा। और यह तीन रुपये हमसे ही लिया जाएगा। दिल्ली में जहां भी इस तरह का प्लांट है, कचरा निश्शुल्क उठाया जाता है मगर हमें 50 से 100 रुपये निगम को देने होंगे। वैज्ञानिक रूप से इस तरह के प्लांट पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं हैं।

- नीरज यादव, आरडब्ल्यूए अध्यक्ष, साउथ सिटी टू

वेस्ट टू एनर्जी किसी भी तरह सही नहीं है। न तो यह स्वास्थ्य की ²ष्टि से सही है न किफायत की ²ष्टि से। इसमें पैसे खर्च होंगे। पर्यावरण प्रदूषित होगा। लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा। इससे ऐसे लोगों का रोजगार खत्म होगा जो कबाड़ से अपने ¨जदगी चलाते हैं। वेस्ट टू इनर्जी किसी भी तरह कचरा प्रबंधन का सही तरीका नहीं है।

-रुचिका सेठी टक्कर, सिटीजन एक्टिविस्ट्र, निर्वाणा कंट्री

अगर प्लास्टिक और स्टायरोफोम जलाया जाता है तो कार्सिनोजेनिक गैस निकलती हैं। इनसे कई किस्म के कैंसर हो सकते हैं। वेस्ट टू इनर्जी प्लांट ऐसा ही जैसे आप कचरे को लैंड फील के जगह स्काई फील कर रहे हैं। इससे पर्टिकुलेट मैटर निकलता है। इसका उदाहरण ओखला में देखा जा सकता है। यहां ऐसे प्लांट से निकलने वाला प्रदूषण काले रंग में लोगों के छतों पर गिरा मिलता है। फरीदाबाद और ओखला की हवा में प्रदूषण की मात्रा वेस्ट टू इनर्जी प्लांट के कारण है।