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फर्ज से नजर फेर रहे डॉक्टर, भगवान भरोसे लोग

  नौकरी हो तो सरकारी और खेती करें तो तरकारी  की। वर्षों से चली आ रही इस कहावत को हरियाणा के युवा नौकरियों के मामले में चरितार्थ करते रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में तस्वीर कुछ दूसरी ही है। यहां के युवा डॉक्टर तो बनना चाहते हैंलेकिन सरकारी नहीं। निजी क्षेत्र में मोटी पगार और रास नहीं आ रही सरकारी नीतियों के चलते वह निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि सरकार को अस्पतालों के लिए डॉक्टर ढूंढ़े नहीं मिल रहे। पुराने विशेषज्ञ डॉक्टर भी सरकारी अस्पतालों से मुंह मोड़ रहे हैं।

स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के हजारों पद खाली हैंलेकिन नए डॉक्टरों की भर्तियां नहीं हो पा रहीं। एक साल पूर्व शुरू हुई 662 डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया में दो महीने पहले जैसे-तैसे 554 डॉक्टरों की नियुक्ति फाइनल हुईलेकिन इनमें से अभी तक 100 ने ही ज्वाइन किया है। पिछले सात-आठ सालों में भर्ती हुए ढाई हजार में से केवल एक तिहाई डॉक्टर ही वर्तमान में सेवाएं दे रहे हैं।स्टाफ की कमी से अस्पतालों में बढ़े काम के बोझ और सरकार की नीतियों से दुखी होकर सरकारी सेवाओं से दूर होने वाले डॉक्टरों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश के 59 अस्पताल, 486 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 119 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में सिर्फ 2045 मेडिकल ऑफिसर और सीनियर मेडिकल ऑफिसर करीब ढाई करोड़ के स्वास्थ्य का जिम्मा संभाले हुए हैं। सरकार द्वारा स्वीकृत पदों में से भी फिलहाल 1109 पद खाली पड़े हैं।  आबादी के हिसाब से कम से कम 27 हजार चिकित्सक होने चाहिए।