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व्यवस्था के अंधेरे में भटकता विशेष बचपन

मुकेश खुराना फतेहाबाद धीड़ गांव की रवीना बताती है कि उसके बच्चे मंदबुद्धि अथवा दिव्यांग होंगे ऐसा सोचा भी नहीं था। लेकिन कुदरत का कहर टूटा। अभी जन्म लिये दो माह भी नहीं बीते कि बड़ा बेटा हिम्मत बुखार की चपेट में आ गया। कमबख्त बुखार भी उसके दिमाग में ऐसा चढ़ा कि उसे मंदबुद्धि बनाकर ही छोड़ा। आफत यहीं नहीं रुकी। उसका छोटा बेटा भी मंदबुद्धि हो गया। उफ्फ । कुदरत ने भी क्या मजाक किया। यह बताते हुए रवीना की आंखें शून्य में खो जाती हैं। मानो वह व्यवस्था के अंधेरे में अपने दो दिव्यांग लालों का भविष्य तलाश रही हो । आवाज देने पर कहती है बच्चे दिव्यांग हैं तो क्या हुआ? मां हूं। मरते दम