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बाढ़ बचाव पर 7 साल में 82 करोड़ खर्च पर नहीं बने तटबंध

     प्रदेशमें हर साल बाढ़ बचाव कार्यों पर भारी रकम भारी रकम खर्च हो रही है। औसतन 12 करोड़ रुपए हर साल खर्च हो रहे हैं। पिछले सात सालों में 82 करोड़ खर्च हो चुके हैं। हर साल एक जैसी समस्या और उसका वैसा ही समाधान। लेकिन तो यमुना के किनारे के जिलों में तटबंध बन पाए और ही बाढ़ प्रभावित गांवों के लिए कोई स्थाई व्यवस्था हो पाई। 

        यहां कार्य पूरा करने का निर्धारित समय 30 जून था जो निकल गया। अब तक 12 कार्यों में पांच ही पूरे बताए जा रहे हैं। हथनी कुंड पर एक करोड़ की लागत से बने कंकरीट ब्लॉक 37 पानी में बिखर गए। बरसात शुरू हो चुकी है अब ज्यादातर निर्माण कार्यों के पानी में बह जाने की रिपोर्ट तैयार करवा दी जाएगी। यही हाल करनाल, पानीपत सोनीपत में भी है। सिविल इंजीनियर जय कुमार कहते हैं कि बाढ़ प्रभावित एरिया में कंकरीट कार्य करने के लिए अधिकारियों को प्लान बनाना चाहिए। तभी पैसे की बर्बादी रकेगी।

     पंचायतों के रेजोल्यूशन, सिंचाई विभाग की प्लानिंग, एसई और चीफ इंजीनियर के दौरे, टेक्निकल कमेटी की रिपोर्ट के बाद सभी डीसी की बैठक। इसके बाद सीएम की अध्यक्षता में फ्लड कंट्रोल बोर्ड की मीटिंग में एस्टीमेट रखा जाता है। यह मीटिंग इस बार 30 मार्च को हुई। इस पूरी प्रक्रिया में 7 माह का समय लग जाता है। इसके बाद 30 जून तक बाढ़ बचाव कार्य पूरे करने का समय मिलता है। मीटिंग में फाइनल होने के बाद चीफ इंजीनियर के पास फाइल दोबारा जाती है। उसके बाद टेंडर कॉल (20 से 30 दिन) और टेंडर पास (20 से 25 दिन) लग जाते है। तब तक बरसात शुरू हो जाती है। इसके बाद जैसे-तैसे छोटे-छोटे पत्थरों से तटबंद बनाकर काम चला दिया जाता है और सारे बचाव कार्य कागजों तक ही सिमट कर रह जाते हैं।