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काम्यकेश्वर तीर्थ में श्रद्धालुओं ने लगाई श्रद्धा की डुबकी

गांव कमोदा के श्री काम्यकेश्वर महादेव मंदिर एवं तीर्थ पर सावन माह की रविवारीय शुक्ला सप्तमी के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धा की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं ने श्री काम्यकेश्वर महादेव का अभिषेक कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। तीर्थ पर सुबह ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई थी। देर सायं तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। मंदिर में भंडारे का भी आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

रविवार को शुक्ला सप्तमी के शुभ अवसर पर श्रद्धालुओं ने मोक्ष के लिए स्नान किया और दान-दक्षिणा दी। मंदिर को लड़ियों से सजाया गया थी और तीर्थ को स्वच्छ जल के साथ भरा गया था।

धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवारीय शुक्ल सप्तमी के दिन तीर्थ में स्नान करने से मोक्ष व पुत्र रत्?न की प्राप्ति होती है। महर्षि पुलस्त्य जी और महर्षि लोमहर्षण जी ने वामन पुराण में का यकवन तीर्थ की उत्पति का वर्णन करते हुए बताया कि इस तीर्थ की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है। एक वार नैमिषारण्य के निवासी बहुत ज्यादा संख्या में कुरुक्षेत्र की भूमि के अंतर्गत सरस्वती नदी में स्नान करने हेतु काम्यवक वन में आए थे। वे सरस्वती में स्नान न कर सके। उन्होंने यज्ञोपवितिक नामक तीर्थ की कल्पना की और स्नान किया, फिर भी शेष लोग उस में प्रवेश ना पा सके तब से मां सरस्वती ने उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए साक्षात कुंज रूप में प्रकट होकर दर्शन दिए और पश्चिम-वाहनी होकर बहने लगी। इससे स्पष्ट होता है कि काम्यकेश्वर तीर्थ एवं मंदिर की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है।

वामन पुराणा के अध्याय 2 के 34 वें श्लोक के काम्यकवन तीर्थ प्रसंग में स्पष्ट लिखा है कि रविवार को सूर्य भगवान पूषा नाम से साक्षात रूप से विद्यमान रहते हैं।

ग्रामीण सु¨मद्र शास्त्री ने बताया कि इसी पावन धरा पर पांडवों को सांत्वना एवं धर्मोपदेश देने हेतु महर्षि वेदव्यास जी, महर्षि लोमहर्षण जी, नीतिवेता विदुर जी, देवर्षि नारद जी, वृहद‌र्श्व जी, संजय एवं महर्षि मरकडेय जी पधारे थे। इतना ही नहीं द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण जी अपनी धर्मपत्नी सत्यभामा के साथ पांडवों को सांत्वना देने पहुंचे थे। पांडवों को दुर्वासा ऋषि के श्राप से बचाने के लिए और तीसरी बार जयद्रथ द्वारा द्रोपदी हरण के बाद सांत्वना देने के लिए भी भगवान श्रीकृष्ण का यकेश्वर तीर्थ पर पधारे थे। पांडवों के वंशज सोमवती अमावस्या, फल्गू तीर्थ के समान शुक्ला सप्तमी का इंतजार करते रहते थे। इस अवसर पर ग्रामीण सुखदेव कमोदा, संजीव, धर्मपाल, महावीर कमोदा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भंडारे में सहयोग किया