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75 प्रतिशत दिव्यांग ने नौकरी से हटने पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को लिखा पत्र

येहैं 49 वर्षीय मनफूल सिंह। हाथ पैरों से 75 प्रतिशत विकलांग। इनकी ये हालत दो साल की उम्र से है। जरूरी टीके बचपन में नहीं लगने से उन्हें ये उम्र भर का दंश झेलना पड़ रहा है। अत्यंत साधारण परिवार में जन्मे मनफूल ने बताया कि अन्य दिव्यांगों की तरह भीख मांगने की बजाए उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान दिया। एमए-बीएड की। सरकार ने इस बेस पर कुछ समय के लिए शिक्षक की नौकरी भी दी, लेकिन स्थाई नियुक्ति होने पर मनफूल मायूस है। 

पूरे मामले के अनुसार मनफूल ने वर्ष 1994 में एमए और 1995 में बीएड की। इस आधार पर मनफूल की हिंदी टीचर के रूप में वर्ष 1997 में राजकीय हाई स्कूल सिलानी गांव में नौकरी लगी। इस दिव्यांग शिक्षक ने कहा कि उसे बताया गया था कि 6 महीने बाद कार्यकाल बढ़ा दिया जाएगा। पक्की नौकरी भी लग सकती है। मनफूल ने इस स्कूल में 5 माह 24 दिन पढ़ाया और इसके बाद उसे स्कूल से रिलीव कर दिया गया। अब बीते 19 साल से मनफूल अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। झज्जर विकलांग यूनियन के सबसे पढ़े-लिखे सदस्य मनफूल अपनी शिक्षक की नौकरी फिर बहाल करने के लिए राष्ट्रपति,लोकायुक्त और प्रदेश के शिक्षा मंत्री से भी अपनी बहाली की गुहार कर चुका है। 

दिल्लीगेट निवासी मनफूल को जब निजी स्कूल संचालकों ने भी नौकरी नहीं दी तो वो अपने परिवार का का पेट सिविल अस्पताल में जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र के फार्म भरकर चला रहा है। मनफूल के परिवार में प|ी,दो बच्चों के अलावा उसकी साली भी है,जो अपने माता-पिता की मौत के बाद इकलौती बहन के घर रहती है।