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प्रवीण यादव के बाद पंकज यादव भी करेगा सेना में सेवा

224 मीडियम रेजिमेंट में सिपाही रहे प्रवीण यादव देश के लिए जीवन को दांव पर लगाकर कारगिल के इतिहास में अपना योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखवा चुके हैं। ऑपरेशन विजय के दौरान मिले जख्मों का असर आज भी उनके शरीर पर दिखाई देता है। युद्ध के दौरान चोटिल होने के कारण प्रवीण के दोनों हाथ नहीं है और दाई टांग भी ठीक ढंग से काम नहीं करती। जबकि हौसले और जज्बे की बात हो तो वह अभी भी किसी से सैनिक से कम नहीं है। वर्तमान समय में जहां उनकी पत्नी ममता अपने पति के प्रति समर्पित होकर जीवन को कुंदन बना रही है। वहीं उनका यह भी कहना है कि जैसे पति ने देश की सेवा की है। वैसे ही उनका बेटा पंकज भी बड़ा होकर एनडीए की तैयारी करेगा। जिसके लिए वह उसे अभी से तैयार भी कर रहे हैं।

भले ही कारगिल युद्ध को हुए 18 साल बीत गए है, मगर उसके जख्म तो कभी नहीं भर सकेंगे। उस समय मात्र 22 साल उम्र थी खातीवास गांव के प्रवीण यादव की जब वह लेह के फ‌र्स्ट ग्लेशियर से उतरकर चुलका की पोस्ट पर तैनात किया गया था। उसी दौरान दुश्मन के हमले में वह 4 जून को घायल हो गए। प्रवीण यादव के दोनों हाथ इस युद्ध में चले गए और उसकी दाई टांग भी ठीक से काम नहीं करती। इसके बाद भी प्रवीण यादव और उनकी पत्?नी ने जीवन से कभी हार नहीं मानीं और अब जीवन को युद्ध की तरह जीता है।

गौरतलब है कि वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान अपने दोनों हाथ गंवा देने वाले प्रवीण यादव का रिश्ता युद्ध से वापस आने के बाद टूट गया था। चूंकि कारगिल युद्ध के दौरान मिले उस दर्द को स्वीकार कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं। लेकिन एक महिला के आदर का यह भाव और अधिक इसलिए बढ़ जाता है कि जब कोई यह जानते हुए कि उसके जख्म जीवन में कष्ट का अहसास कराएंगे और वह उसे अपना ले। वर्ष 2004 में प्रवीण यादव के साथ हुई उनकी शादी के बाद से उन्होंने अपने पति एवं परिवार की सेवा की जो मिसाल यहा कायम की है। उसे सलाम किया जाना बनता है।

प्रवीण यादव के जीवन में 2004 में एक तरह से नया जीवन आया। महेद्रगढ़ के डुलोढ़ गाव की ममता ने प्रवीण यादव से विवाह किया। विवाह पूर्व ही प्रवीण यादव ने उसे अपने जीवन की सारी किताब खोलकर बता दी कि वह आश्रित है। विवाह पूर्व दोनों की बातचीत कराई गई। दांपत्य को 13 वर्ष की अवधि बीतने के बाद उनके पास एक बेटा है। पंकज उनके लिए सब कुछ है और लालन-पालन और पढ़ाई के लिए वे सब कुछ न्यौछावर करते है। ममता ही अपने पति की अपने हाथों से खाना खिलाती है और पानी भी पिलाती है। यह उसके जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। सरल स्वभाव की ममता पूछने पर ज्यादा कुछ नहीं बोलती, मगर कहती है कि मुझे जीवन में सुख है और मैं प्रसन्न हू। ये मेरे लिए सौभाग्य है कि मैं पति की सेवा कर पा रही हूं। प्रवीण यादव भी कहते है कि मैंने पिछले जन्म में कुछ अच्छा कर्म किया है जो मुझे ममता जैसी पत्?नी मिली है। वैसा देखा जाए तो 1999 के बाद जीवन के पांच वर्ष उसने इसी तरह से गुजारे। चूंकि प्रवीण यादव स्वयं पानी की गिलास भी नहीं उठा सकता। खाना भी नहीं खा सकता। नहाना-धोने को भी दूसरों पर आश्रित था। इसके लिए तीन वर्ष तक प्रवीण के मामा के एक लड़के ने उसकी सेवा की। बाद में जब शादी हुई तो ममता यादव ने उन्हे सहारा ही नहीं पूर्ण रुप से स्वीकार करते हुए ऐसा अपनाया है कि दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए है।