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लोहड़ी और मकर संक्रांति की तैयारी शुरू

 पलवल : लोहड़ी व मकर सक्रांति ऐसे पर्व हैं, जिन पर हर कोई झूम उठता है। सर्दी थोड़ी कम होने लगती है तथा मौसम खुशगवार होने लगता है। अब जैसे-जैसे लोहड़ी व मकर संक्रांति का त्योहार नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे ही इन्हें मनाने की तैयारियां जोरों पर शुरू हो गई हैं।

वैसे तो लोहड़ी का त्योहार सभी वर्ग मनाते हैं, परंतु पंजाबी वर्ग में यह इसे परंपरागत तौर पर मनाया जाता है। इसी तरह लोहड़ी से अगले दिन मकर संक्रांति का त्योहार भी धूमधाम व पारंपरिक रीति रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इन त्योहारों पर जरूरतमंदों की मदद की जाती है। इन पर्वों के नजदीक आते ही फिजा में सुंदरिए-मुंदरिए हो, तेरा कौन बिचारा हो गीत के स्वर सुनाई देने लगे हैं।

इन त्योहारों को एकता का प्रतीक भी माना जाता है। लोहड़ी को पहले तिलोड़ी के नाम से जाना जाता था। ये शब्द गुड़ और रोटी, इन दो शब्दों के मेल से बना है, जो बाद में लोहड़ी के रुप में प्रचलित हो गया। कई जगह ऐसी मान्यता भी है कि इस पर्व को संत कबीर की पत्नी लोई की याद में भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति का संबंध सूर्य से भी है। इन त्योहारों के साथ कुछ पारंपरिक चीजें भी जुड़ी हैं। गेहूं की फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च में काटी जाती है, लोहड़ी व संक्रांति पर्व तक यह पता चल जाता है कि फसल कैसी होगी। इसलिए लोहड़ी के समय लोग उत्साह से भर जाते हैं।

लोहड़ी व मकर संक्रांति के पर्व के लिए बाजार से खरीदारी भी शुरू हो गई है। लोहड़ी पर जहां यज्ञ करने व शाम को लोहड़ी जलाकर लोकनृत्य भंगड़ा व गिद्दा करने का रिवाज है। साथ ही एक दूसरे को रेवड़ी, मूंगफली व तिल से बने पदार्थो को वितरित करने का प्रचलन है। वहीं मकर संक्रांति पर चने का साग व गर्म वस्तुएं खाई जाती हैं। इसके अलावा महिलाएं जरूरतमंदों की मदद भी करती हैं।

लोहड़ी के समय लोग उत्साह से भर जाते हैं। त्योहार को मनाने के तरीके में भी थोड़ा बदलाव आया है। ढोल-नंगाड़े वालों की पहले ही बु¨कग कर ली जाती है। अनेक प्रकार के गाने बजाने वाले यंत्रों के साथ जब लोहड़ी के गीत शुरू होते हैं तो स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे सभी स्वर में स्वर, ताल में ताल मिलाकर नाचने लगते हैं।'ओए, होए बारह वर्षी खडन गया सी, खडके लेआंदा रेवड़ी, इस तरीके के पंजाबी गाने लोहड़ी की खुशी में खूब गाए जाते है।