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शिक्षकों की भर्ती में बाधक नई पेंशन स्कीम

महेंद्रगढ़: केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष शिक्षण संस्थानों में भी बढि़या अकादमिक अनुभव वाले ख्यातिलब्ध शिक्षक आने से कतरा रहे हैं जबकि इनमें सेवानिवृत्ति आयु स्टेट यूनिवर्सिटीज से तीन वर्ष अधिक है। इसमें सबसे बड़ी बाधा नई पेंशन योजना बनी हुई है। पुरानी पेंशन पोर्टेबिलिटी नहीं होने के चलते केंद्रीय संस्थानों में चयन के बावजूद वरिष्ठ प्रोफेसर इनमें आने से इन्कार कर देते हैं। इसके चलते केंद्रीय विश्वविद्यालय का प्रबंधन चाहकर भी अच्छे शिक्षकों को अपने संस्थान के साथ नहीं जोड़ पा रहा।

स्टेट यूनिवर्सिटीज, डीम्ड यूनिवर्सिटी व निजी विश्वविद्यालयों में सालों से काम कर रहे वरिष्ठ प्रोफेसर्स वहां पर पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आते हैं। इसमें उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद अधिक लाभ मिलेगा। पुरानी पेंशन योजना के तहत उनकी पेंशन आखिरी वेतन और सेवाकाल की अवधि से तय होती है जबकि नई पेंशन स्कीम में उतना लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए 55 साल की उम्र से अधिक के शिक्षक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सेवा देने की बजाय अपने पुराने संस्थानों को ही अधिमान दे रहे हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है जबकि स्टेट यूनिवर्सिटीज में 62 वर्ष। इसके अलावा यहां बेहतर सेवा नियम और माहौल भी उपलब्ध है। लेकिन पुरानी पेंशन की पोर्टेबिलिटी नहीं होने से ये सारे आकर्षण फीके पड़ जाते हैं। यदि सरकार पुरानी पेंशन योजना में शामिल कर्मचारियों को नए संस्थानों में जाने पर भी पुरानी पेंशन योजना में शामिल रहने देती है तो इस समस्या का हल निकल सकता है।

सूत्रों के अनुसार गत सप्ताह राष्ट्रपति रामनाथ को¨वद के समक्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों व अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपतियों की बैठक में भी राष्ट्रपति ने इन संस्थानों में खाली पड़े शिक्षकों के पदों पर ¨चता जताते हुए जल्द भर्ती करने के लिए कहा था। तब कुछ शिक्षाविदों ने इस समस्या को उनके समक्ष उठाया था। इस पर मामला केंद्र सरकार के संज्ञान में लाया गया है।